tag:blogger.com,1999:blog-7845169987975672699.post-72335626975716311842007-07-04T09:07:00.000-07:002007-07-05T09:45:55.846-07:00धडकन तुम्हारिकेवल तुम्हारे खातिर्, बदनाम हुए हम्, तनहाईया कि बारात मे गुमनाम हुए हम ।
छु-कर देखा था, कभि धडकन तुम्हारि, दुनिया वालो मे से, गम कि पहचान हुए हम । आशिकी इस क़दर, छा गयी मुझ पर,कि अपनो से भी, अनजान हुये हम । बस ! अब तो , याद बची है तुम्हारी,आये कोई क्योँ यहा, शमशान हुए हम .
बोगटी सरोजhttp://www.blogger.com/profile/07885196120027936275noreply@blogger.com