tag:blogger.com,1999:blog-7845169987975672699.post-12191771056687741032007-08-26T10:05:00.001-07:002007-08-27T03:42:57.650-07:00कम्बख्त यह जिन्दगी<!--chitthajagat claim code--> <!--chitthajagat claim code--> दुरी लिखा और, कभी मजबुरी लिखा, वो कम्बख्त लेकिन, जिन्दगी पुरी लिखा । अपने गम कि परछाई, सोया नही अभी, वहाँ भि उसकी, दिलकी बहादुरी लिखा । शुक्र है छुट गए, हारने मे से हम, फिर भि जितवादियो से, मिलो कि दुरी लिखा । टुटते कभी जुडते, पहुच गए हम, मुकाम पर आए तो, फिर आधि-हुरी लिखा । हा, याद आई है, उसकी आज हमे, इसलिए तो प्रसशा, बोगटी सरोजhttp://www.blogger.com/profile/07885196120027936275noreply@blogger.com