केवल तुम्हारे खातिर्, बदनाम हुए हम्,
तनहाईया कि बारात मे गुमनाम हुए हम ।
छु-कर देखा था, कभि धडकन तुम्हारि,
दुनिया वालो मे से, गम कि पहचान हुए हम ।
आशिकी इस क़दर, छा गयी मुझ पर,
कि अपनो से भी, अनजान हुये हम ।
बस ! अब तो , याद बची है तुम्हारी,
आये कोई क्योँ यहा, शमशान हुए हम .






