2007-08-26

कम्बख्त यह जिन्दगी

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

दुरी लिखा और, कभी मजबुरी लिखा,
वो कम्बख्त लेकिन, जिन्दगी पुरी लिखा ।
 
 अपने गम कि परछाई, सोया नही अभी,
वहाँ भि उसकी, दिलकी बहादुरी लिखा ।
 
 
शुक्र है छुट गए, हारने मे से हम,
फिर भि जितवादियो से, मिलो कि दुरी लिखा ।
 
 
टुटते कभी जुडते, पहुच गए हम,
मुकाम पर आए तो, फिर आधि-हुरी लिखा ।
 
 
हा, याद आई है, उसकी आज हमे,
इसलिए तो प्रसशा, दिल से भुरि-भुरी लिखा ।
 

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