दुरी लिखा और, कभी मजबुरी लिखा,
वो कम्बख्त लेकिन, जिन्दगी पुरी लिखा ।
अपने गम कि परछाई, सोया नही अभी,
वहाँ भि उसकी, दिलकी बहादुरी लिखा ।
शुक्र है छुट गए, हारने मे से हम,
फिर भि जितवादियो से, मिलो कि दुरी लिखा ।
टुटते कभी जुडते, पहुच गए हम,
मुकाम पर आए तो, फिर आधि-हुरी लिखा ।
हा, याद आई है, उसकी आज हमे,
इसलिए तो प्रसशा, दिल से भुरि-भुरी लिखा ।
पहचान-पर्ची: कम्बख्त जिन्दगी, chitthahjagat.in








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